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Monday, January 4, 2010

भिक्षुक/Bhikshuk

वह आता--


दो टूक कलेजे के करता पछताता

पथ पर आता।







पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।







साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,

बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।

भूख से सूख ओठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?--

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!


वीणा वादिनि/Var de Veena Vadini


वर दे, वीणावादिनि वर दे।

प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव

भारत में भर दे।



काट अंध उर के बंधन स्तर

बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर

कलुष भेद तम हर प्रकाश भर

जगमग जग कर दे।



नव गति नव लय ताल छंद नव

नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव

नव नभ के नव विहग वृंद को,

नव पर नव स्वर दे।



वर दे, वीणावादिनि वर दे।